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पटना ब्रिज पर बच्चों का नट-बोल्ट चैलेंज, बिहार में पुलों की सुरक्षा पर फिर सवाल

पटना के फ्लाईओवर पर बच्चों द्वारा नट-बोल्ट खोलने का वीडियो वायरल हुआ है, जिससे बिहार में पुलों की गुणवत्ता और सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठे हैं।

पटना में 422 करोड़ के डबल-डेकर फ्लाईओवर पर बच्चों का नट-बोल्ट खोलना इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियो में कुछ बच्चे दिनदहाड़े पुल के नट-बोल्ट ऐसे खोल रहे हैं जैसे कोई खिलौना हो, और फिर भाग जाते हैं। जिस पुल को उद्घाटन के कुछ ही दिन हुए हों, उस पर बच्चे ऐसे हाथ से नट-बोल्ट खोल लें, तो सवाल बनता है, ये पुल बना है या जुगाड़? सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने तो कमेंट्स की झड़ी लगा दी, “थोड़ा दिन रुकिए, पुल भी नहीं दिखेगा!” कोई बोला, “बिहार बदल रहा है, अब पुल भी DIY (Do It Yourself) हो गया है।” एक और ने लिखा, “ऐसा नट-बोल्ट जो हाथ से खुल जाए, इंजीनियरिंग का नया चमत्कार!” कुछ ने तो ये भी पूछ लिया, “क्या ये नट-बोल्ट चीन से मंगवाए थे?” अब बच्चे तो मासूम हैं, उन्हें क्या पता कि वो पुल की सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं या बिहार की इंजीनियरिंग को। वैसे, अगर बच्चों के हाथों से पुल खुल जाए, तो अगली बार बिहार में पुल के उद्घाटन के साथ-साथ ‘नट-बोल्ट टाइटनिंग’ प्रतियोगिता भी होनी चाहिए, जिसमें विजेता को पुल की चाबी मिलेगी!

बिहार के पुल: गिरना, टूटना और अब खुलना, सबकुछ आम है

अगर आपको लगता है कि बच्चों का नट-बोल्ट खोलना बिहार के पुलों के लिए नई बात है, तो जरा ठहरिए। पिछले साल बिहार में 15 से ज्यादा पुल एक महीने में गिर गए थे। कहीं उद्घाटन के 29 दिन बाद पुल धराशायी, तो कहीं 15 साल पुराना पुल एक झटके में नदी में। जून-जुलाई 2024 में तो 17 दिनों में 12 पुल गिर गए। अब पुल गिरना, टूटना, बहना और अब बच्चों के हाथों खुलना, बिहार के पुलों के लिए ये सब आम बात हो गई है। सोशल मीडिया पर तो लोग कहने लगे हैं, “बिहार में पुल बनाओ, गिराओ, और फिर बनाओ, यही रोजगार का नया चक्र है।”

इंजीनियरिंग की पोल: नट-बोल्ट ऐसे जैसे मैगी की पैकिंग

पुलों के गिरने या नट-बोल्ट खुलने के पीछे सबसे बड़ा कारण है घटिया निर्माण, सस्ता माल, डिजाइन की गड़बड़ी, और निगरानी की कमी। कई पुल तो उद्घाटन के महीने भर के भीतर ही गिर गए। अधिकारी कहते हैं, “भारी बारिश, नेपाल से आई बाढ़, और नदी की धारा में बदलाव से पुल गिर गए।” लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि असली वजह है, सीमेंट, रेत, गिट्टी और लोहे में कटौती, इंजीनियरों की लापरवाही और ठेकेदारों की मनमानी। अब जब नट-बोल्ट हाथ से खुल जाएं, तो समझ लीजिए कि पुल की मजबूती मैगी के पैकेट जैसी है, हल्का सा झटका और खुल गया!

पुल गिरने के बाद क्या होता है? इंजीनियर सस्पेंड, ठेकेदार फरार

हर बार पुल गिरता है, तो सरकार तुरंत जांच के आदेश देती है, इंजीनियर सस्पेंड होते हैं, ठेकेदारों पर कार्रवाई की बात होती है। पिछले साल 15 इंजीनियर सस्पेंड हुए, ठेकेदारों की पेमेंट रोक दी गई, और फिर वही इंजीनियर नए पुल के निर्माण में लग गए। विपक्ष कहता है, “बिहार में पुल गिरना अब त्योहार जैसा हो गया है, हर साल मनाया जाता है।” वहीं, सरकार कहती है, “हमने सभी पुराने पुलों का सर्वे कराने का आदेश दिया है, जल्द ही सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन जनता जानती है कि अगली बारिश में कौन सा पुल गिरने वाला है, और अगला वायरल वीडियो किसका होगा।

जनता का भरोसा और सोशल मीडिया का मजाक

बिहार में पुलों की हालत पर अब जनता को भरोसा कम और मजाक ज्यादा होने लगा है। कोई कहता है, “बिहार में पुल पर चलना है तो हेलमेट पहनकर चलो।” कोई वीडियो वायरल करता है, “ब्रिज गिरा, जनता हंसी, इंजीनियर सस्पेंड, ठेकेदार गायब।” अब तो पुलों के उद्घाटन पर लोग शर्त लगाने लगे हैं कि ये कितने दिन चलेगा। वहीं, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है, “बिहार के पुल, टिकाऊ कम, दिखाऊ ज्यादा।”

बिहार में पुल बनाना आसान, टिकाना मुश्किल

पटना का डबल-डेकर फ्लाईओवर हो या अररिया का बकौर-भेजा घाट पुल, बिहार में पुल बनाना जितना आसान है, टिकाना उतना ही मुश्किल। कभी बारिश, कभी बाढ़, कभी घटिया माल, कभी बच्चों की शरारत, हर साल कोई न कोई वजह पुलों के गिरने या खुलने की मिल ही जाती है। सरकार जांच के आदेश देती है, इंजीनियर सस्पेंड होते हैं, लेकिन असली सवाल वही रह जाता है, “बिहार के पुल कब तक चलेंगे?” फिलहाल तो जनता को सलाह है, पुल पर चलते वक्त आंख-कान खुले रखें, और अगर कोई बच्चा नट-बोल्ट खोलता दिखे, तो वीडियो बनाना न भूलें, क्या पता अगला वायरल वीडियो आपका ही हो!

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रीतु कुमारी The Jan Post की एक उत्साही लेखिका हैं, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई बीजेएमसी (BJMC), JIMS इंजीनियरिंग मैनेजमेंट एंड टेक्निकल कैंपस ग्रेटर नोएडा से पूरी की है। वे समसामयिक समाचारों पर आधारित कहानियाँ और रिपोर्ट लिखने में विशेष रुचि रखती हैं। सामाजिक मुद्दों को आम लोगों की आवाज़ बनाकर प्रस्तुत करना उनका उद्देश्य है। लेखन के अलावा रीतु को फोटोग्राफी का शौक है, और वे एक अच्छी फोटोग्राफर बनने का सपना भी देखती है। रीतु अपने कैमरे के ज़रिए समाज के अनदेखे पहलुओं को उजागर करना चाहती है।

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