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भारत की जैव विविधता संकट: प्रकृति का खजाना बचाने की अंतिम लड़ाई

भारत की जैव विविधता जलवायु परिवर्तन और मानवीय दबावों से गंभीर संकट में है, जिससे वन्यजीवों के आवास, प्रजातियाँ और पारिस्थितिक सेवाएँ तेजी से प्रभावित हो रही हैं।

भारत का स्थान पृथ्वी के 17 ‘मेगा-डाइवर्सिटी’ देशों में है, जहाँ इस ग्रह की ज्ञात प्रजातियों का लगभग 7.5% भाग पनपता है। यह विविधता हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर पश्चिमी घाट के घने सदाबहार वनों, सुंदरबन के जटिल मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र से लेकर राजस्थान के विशाल मरुस्थलों तक फैली हुई है। यह केवल भौगोलिक विविधता नहीं है; यह लाखों वर्षों के विकास का जीवंत साक्ष्य है, जो प्रकृति और मानव संस्कृति के बीच एक गहन अंतर्संबंध बुनता है। ये जंगल, नदियाँ, पर्वत और मैदान न केवल अनगिनत प्रजातियों का घर हैं, बल्कि मानव समाज के लिए अमूल्य पारिस्थितिक सेवाएँ प्रदान करते हैं; जलवायु नियमन, जल संचय, मृदा संरक्षण और फसल परागण। परंतु यह अमूल्य विरासत अब एक गहन और बहुआयामी संकट का सामना कर रही है।

केंद्र विज्ञान एवं पर्यावरण (सीएसई) की हालिया रिपोर्ट एक भयावह तस्वीर पेश करती है: वर्ष 2024 भारत का अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा, जिसमें 88% दिनों में चरम मौसमी घटनाओं (लू, बाढ़, सूखा, चक्रवात) ने तबाही मचाई। इसका जैव विविधता पर प्रत्यक्ष एवं विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। हिम तेंदुओं के आवास सिकुड़ रहे हैं क्योंकि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। समुद्री कछुओं के प्रजनन तट समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण जलमग्न हो रहे हैं या कटाव का शिकार हो रहे हैं। पक्षियों के प्रवास चक्र अनियमित हो गए हैं क्योंकि फूलों के खिलने और कीटों की उपलब्धता का मौसमी समय बदल गया है। पिछले चार दशकों में देश की लगभग एक-तिहाई प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ शहरीकरण, कृषि विस्तार और प्रदूषण की भेंट चढ़ चुकी हैं।

विशेषज्ञ एक स्वर में चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तत्काल, समन्वित और ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, गोडावण और गंगा डॉल्फिन जैसी प्रतिष्ठित प्रजातियों को केवल संग्रहालयों के प्रदर्शनों या इतिहास की पुस्तकों में ही देख पाएँगी। यह संकट केवल वन्यजीवों का नहीं है; यह मानवता के अपने भविष्य, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान का भी संकट है।

विलुप्ति के कगार पर खड़ी प्रजातियाँ

भारत की सबसे प्रतिष्ठित और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियाँ अस्तित्व की एक निरंतर जंग लड़ रही हैं, जिसमें मानव गतिविधियों ने उनके विरुद्ध भारी बाधाएँ खड़ी कर दी हैं। राष्ट्रीय पशु बंगाल टाइगर, जिसकी वैश्विक आबादी का लगभग 70% भारत में रहता है (लगभग 3,600 व्यक्ति), अब नए और जटिल संकटों से जूझ रहा है।

प्रोजेक्ट टाइगर ने संख्या में सुधार लाने में ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है, परंतु यह सफलता अब नई चुनौतियों से घिरी है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में उनके प्राथमिक शिकार जैसे चीतल, सांभर और जंगली भैंसों की आबादी में चिंताजनक गिरावट आई है। इसका कारण है उनके आवासों का विखंडन, अवैध शिकार और मानव दखल।

इस शिकार की कमी के कारण बाघ भुखमरी से बचने के लिए मानव बस्तियों की ओर रुख करने को मजबूर होते हैं, जिससे मानव-बाघ संघर्ष में भयावह वृद्धि हो रही है। आँकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिवर्ष बाघ हमलों से औसतन 56 लोगों की मृत्यु होती है, जो 2020 के बाद से दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा दर्शाता है। यह संघर्ष दोनों पक्षों के लिए त्रासदी है, मानव जानें जा रही हैं और बाघों को अक्सर मैन-ईटर घोषित कर दिया जाता है या उन्हें मार दिया जाता है।

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एशियाई हाथियों की स्थिति और भी अधिक गंभीर है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में इन्हें विलुप्तप्राय (Endangered) श्रेणी में रखा गया है। भारत में लगभग 27,000 हाथी बचे हैं, लेकिन वे दोहरे हमले का सामना कर रहे हैं। एक ओर, उनके विशाल दाँतों के लिए अवैध शिकार का खतरा हमेशा मंडराता रहता है।

दूसरी ओर, और शायद अधिक व्यापक रूप से, जंगलों के तेजी से सिकुड़ने और विखंडित होने के कारण उनके प्राकृतिक गलियारे अवरुद्ध हो गए हैं। हाथियों को भोजन और पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिसमें वे अनिवार्य रूप से कृषि भूमि और मानव बस्तियों से टकराते हैं। इसका परिणाम है संपत्ति का विनाश, फसलों की बर्बादी और दुर्भाग्यपूर्ण मानव मृत्यु। 2020-2023 की अवधि में हाथी हमलों से होने वाली मानव मृत्यु दर में 36% की भयावह वृद्धि दर्ज की गई है। यह ट्रेंड हाथियों और उनके साथ सह-अस्तित्व में रहने वाले समुदायों दोनों के लिए एक गंभीर संकट का संकेत देता है।

विनाश के स्रोत: मानवीय गतिविधियों का भारी दबाव

भारत की जैव विविधता पर संकट किसी एक कारण से नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों के एक जटिल जाल के कारण है, जो पर्यावरण पर भारी दबाव डाल रहा है। इनमें से सबसे विनाशकारी है वन विनाश और आवास क्षरण। 2001 से 2020 के बीच भारत ने लगभग 1.93 मिलियन हेक्टेयर वृक्षावरण खो दिया है, जो दिल्ली राज्य के क्षेत्रफल से भी अधिक है। केवल वित्त वर्ष 2023-24 में ही विकास परियोजनाओं (सड़कें, बांध, खनन, उद्योग, शहरी विस्तार) के लिए लगभग 29,000 हेक्टेयर वन भूमि को डाइवर्ट करने की मंजूरी दी गई।

यह केवल संख्याएँ नहीं हैं; यह अनगिनत प्रजातियों के घरों, भोजन स्रोतों और प्रजनन स्थलों का विनाश है। अरावली पर्वतमाला, जो उत्तर भारत के विशाल मैदानी इलाकों को थार के मरुस्थल के विस्तार से बचाने वाली एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक और जलविज्ञानीय रक्षा कवच है, अवैध खनन और बेतहाशा रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स की भेंट चढ़ रही है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और पहाड़ियों के नष्ट होने से न केवल वन्यजीव बेघर हो रहे हैं, बल्कि भूजल पुनर्भरण कम हो रहा है और मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ रहा है।

इसी तरह, महाराष्ट्र के अमरावती जिले में पत्थर खनन का व्यापक पैमाना पूरे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को तहस-नहस कर रहा है। पहाड़ियों के कटने से जलस्रोत सूख रहे हैं या प्रदूषित हो रहे हैं, जिससे स्थानीय ग्रामीणों और कृषि पर भीषण प्रभाव पड़ रहा है। उपजाऊ भूमि बंजर हो रही है, और खनन कार्यों से उड़ने वाली धूल ने वायु प्रदूषण को खतरनाक स्तर तक पहुँचा दिया है, जिससे स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। आवास का यह विखंडन और नुकसान जानवरों को छोटे-छोटे द्वीपों में सिमटने को मजबूर करता है, जिससे आनुवंशिक विविधता कम होती है और लंबी अवधि में उनके अस्तित्व की संभावना कमजोर पड़ती है।

संरक्षण के प्रयास: सफलताएँ, चुनौतियाँ और जमीनी हकीकत

इस गहन संकट के बीच, भारत में जैव विविधता को बचाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास चल रहे हैं, जिनमें कुछ उल्लेखनीय सफलताएँ भी मिली हैं, लेकिन चुनौतियाँ अभी भी बहुत बड़ी हैं। सरकारी स्तर पर, कुछ पुरानी और कुछ नई पहलें काम कर रही हैं।

प्रोजेक्ट टाइगर (1973) भारत की सबसे प्रसिद्ध और सफल वन्यजीव संरक्षण पहलों में से एक है। इसके तहत देश भर में 54 टाइगर रिजर्व स्थापित किए गए हैं, जिन्होंने बाघों की संख्या को ऐतिहासिक निचले स्तर (1970 के दशक में लगभग 1,800) से बढ़ाकर लगभग 3,600 तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी तरह, प्रोजेक्ट एलिफेंट (1992) के तहत 33 हाथी अभयारण्यों की स्थापना की गई है, जो हाथियों को सुरक्षित आवास और गलियारे प्रदान करने का प्रयास करते हैं।

हाल ही में, तमिलनाडु के धनुषकोडी लैगून को आधिकारिक तौर पर ग्रेटर फ्लेमिंगो अभयारण्य घोषित किया गया है। यह कदम वहाँ हर साल आने वाले हजारों गुलाबी फ्लेमिंगो सहित अन्य प्रवासी पक्षियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है और अन्य राज्यों में भी ऐसे प्रयासों के लिए एक मिसाल कायम करता है। राष्ट्रीय जैव विविधता मिशन जैसे कार्यक्रम वनों के डिजिटलीकरण, स्थानीय समुदायों को संरक्षण कौशल में प्रशिक्षण देने और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य की निगरानी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) अवैध शिकार और तस्करी के खिलाफ जांच और कार्रवाई को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है

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रीतु कुमारी The Jan Post की एक उत्साही लेखिका हैं, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई बीजेएमसी (BJMC), JIMS इंजीनियरिंग मैनेजमेंट एंड टेक्निकल कैंपस ग्रेटर नोएडा से पूरी की है। वे समसामयिक समाचारों पर आधारित कहानियाँ और रिपोर्ट लिखने में विशेष रुचि रखती हैं। सामाजिक मुद्दों को आम लोगों की आवाज़ बनाकर प्रस्तुत करना उनका उद्देश्य है। लेखन के अलावा रीतु को फोटोग्राफी का शौक है, और वे एक अच्छी फोटोग्राफर बनने का सपना भी देखती है। रीतु अपने कैमरे के ज़रिए समाज के अनदेखे पहलुओं को उजागर करना चाहती है।

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