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भाजपा द्वारा पेश वक्फ़ बिल से ठगा गया मुसलमान समुदाय — “गद्दार” Nitish और Naidu की भूमिका

वक्फ़ संशोधन विधेयक 2025 के ज़रिए मुस्लिम समुदाय की धार्मिक संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण की तैयारी हो चुकी है, और नीतीश-नायडू जैसे नेताओं की खामोशी ने इस ठगे जाने की पीड़ा को और गहरा कर दिया है।

2025 का वक्फ़ संशोधन विधेयक, देश की मुस्लिम आबादी की धार्मिक एवं ऐतिहासिक संपत्तियों पर सरकारी दखल का द्वार खोलता है। यह क़ानून वक्फ़ की ज़मीनों, मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों के संरक्षण को कानूनी रूप से कमजोर करता है।लोकसभा में पारित होते ही यह विधेयक न केवल समुदाय की भावनाओं को आहत करता है, बल्कि देश को एक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर भी धकेलता है।

अंततः मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ग़लत और मुहम्मद अली जिन्ना सही साबित हो रहे हैं। देश के बंटवारे के समय जिन्ना ने जो आशंकाएँ जताई थीं, वे आज एक-एक कर सच होती जा रही हैं। 1857 की क्रांति में हज़ारों उलमा की शहादत, वीर अब्दुल हमीद और ब्रिगेडियर उस्मान की कुर्बानी को दरकिनार कर अब मुसलमानों के अधिकार छीनने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

मुसलमानों के पूर्वजों द्वारा दान की गई वक्फ़ संपत्तियों को उनसे छीनने वाला कानून लोकसभा में पारित हो चुका है। इसके साथ ही देश में दंगों और सांप्रदायिक झगड़ों की ज़मीन और चौड़ी होती जा रही है। वक्फ़ की संपत्तियाँ — जिनमें मस्जिदें, मदरसे, दरगाहें और कब्रिस्तान शामिल हैं — मुसलमानों की आस्था से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इन पर कब्ज़े की सरकारी कोशिश के खिलाफ अगर मुसलमानों ने विरोध किया तो प्रशासन को सीधे गोली चलाने का बहाना मिलेगा, और यही विरोध दंगों व फसाद का रूप ले सकता है।

लोकसभा में पारित वक्फ़ संशोधन विधेयक इसी दिशा में देश को ले जाता प्रतीत होता है। भले ही सरकार ने संसद में जीत दर्ज की हो, लेकिन दस घंटे की बहस में उसकी नैतिक हार स्पष्ट हो गई है। इस बहस ने यह भी उजागर कर दिया कि सरकार की मंशा क्या है — और देश व दुनिया अब यह देख रहे हैं।

सबसे बड़ा धोखा चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार ने किया, जिन्होंने इफ्तार व ईद पर मुसलमानों से झूठे वादे किए। अब मुसलमानों की उम्मीद उन दलों से है, जिनके भरोसे उनके पूर्वज भारत में रुके। क्या कांग्रेस, सपा, राजद, टीएमसी जैसे दल वक्फ़ बिल के विरोध में सड़कों पर उतरेंगे? यदि ये एकजुट होकर देशव्यापी आंदोलन छेड़ें, तो कुछ बदलाव संभव है, लेकिन दुर्भाग्यवश यह सभी दल अब निष्क्रिय और डरे हुए प्रतीत होते हैं।

नीतीश कुमार को 2020 के विधानसभा चुनावों में मुसलमानों के 12% वोट मिले थे, यानी लगभग 20 लाख वोट। ये वोट अकेले ही उनकी 16 सीटों को पलट सकते हैं। वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM को बिहार में 11% यानी लगभग 18 लाख मुस्लिम वोट मिले थे। यदि ये वोट एक साथ आ जाएं, तो एक ठोस राजनीतिक शक्ति बन सकती है।

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इस बार मुस्लिम मतों को बिखरने नहीं देना चाहिए, क्योंकि यही राज्य सरकार अब वक्फ़ संपत्तियों को हड़पने वाली है। आने वाले समय में इन्हीं संपत्तियों पर कोई शेखर यादव या यति नरसिंहानंद जैसे चेहरे बैठा दिए जाएंगे।

तेजस्वी यादव को सलाह दी जाती है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में ओवैसी को गठबंधन में शामिल करें और सीमांचल की सीटें उन्हें दें। भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने की यह एकमात्र रणनीति हो सकती है। नहीं तो बिहार हारना तय है — और इसकी सबसे बड़ी क़ीमत मुसलमानों को ही चुकानी पड़ेगी, क्योंकि अर्चना एक्सप्रेस पर चढ़ा ड्राइवर अब पागल हो चुका है।

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अनिल यादव एक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो Anil Yadav Ayodhya के नाम से जाने जाते हैं। अनिल यादव की कलम सच्चाई की गहराई और साहस की ऊंचाई को छूती है। सामाजिक न्याय, राजनीति और ज्वलंत मुद्दों पर पैनी नज़र रखने वाले अनिल की रिपोर्टिंग हर खबर को जीवंत कर देती है। उनके लेख पढ़ने के लिए लगातार The Jan Post से जुड़े रहें, और ताज़ा अपडेट के लिए उन्हें एक्स (ट्विटर) पर भी फॉलो करें।

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