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नई शिक्षा नीति 2020: गरीबों की शिक्षा पर संकट, हजारों सरकारी स्कूल बंद

नई शिक्षा नीति 2020 के तहत यूपी में हजारों सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। शिक्षा का अधिकार खत्म कर शिक्षा को निजी व्यापार बनाया जा रहा है, जिससे गरीब बच्चे शिक्षा से दूर हो रहे हैं।

भाजपा सरकार की लाई गई नई शिक्षा नीति 2020 अब गरीबों और वंचितों के खिलाफ एक हथियार बन चुकी है। इसका असली चेहरा अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। जहाँ शिक्षा का अधिकार था, वहाँ अब ‘क्लोज़र और मर्जर’ के नाम पर शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है, और अब लगभग 30,000 प्राथमिक विद्यालयों को बंद किया जा रहा है!

उत्तर प्रदेश में पहले ही 50 से कम छात्रों वाले हजारों सरकारी प्राथमिक स्कूलों को धड़ाधड़ बंद किया जा रहा है। अब नया आदेश आया है कि जिन हाईस्कूल और इंटर कॉलेजों में 100 से कम छात्र हैं, उन्हें भी बंद किया जाएगा!

क्या योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कभी पूछा कि इन सरकारी स्कूलों में छात्र कम क्यों हो रहे हैं? उन्हें quality-based education क्यों नहीं दिया जा रहा है? अलग-अलग विषयों के अलग-अलग विशेष अध्यापक क्यों नहीं मिलते? शिक्षा के लिए स्कूलों का मूल बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर क्यों नहीं मिला? और क्या उस क्षेत्र की गरीबी, पलायन, और प्रशासनिक उपेक्षा सरकारी स्कूलों की इस दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं है?

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने दिखाया कि सरकारी स्कूल भी प्राइवेट से बेहतर हो सकते हैं। 1000 से अधिक स्कूलों के शिक्षकों को सिंगापुर और फिनलैंड भेजा गया। स्कूल ऑफ एक्सीलेंस आज विदेशों में चर्चा का विषय हैं। अमेरिका तक से शिक्षक इन्हें देखने भारत आए। दिल्ली सरकार ने साबित किया कि अगर नीयत हो तो गरीब का बच्चा भी कॉन्वेंट जैसी शिक्षा पा सकता है!

सरकार ने पहले तो प्राइवेट स्कूलों को खुली छूट दी, अब सरकारी स्कूलों को ही बंद किया जा रहा है। जो स्कूल पिछड़े, दलित, आदिवासी समाज के गरीब बच्चों के लिए अंतिम सहारा थे, उन्हें ही मिटाया जा रहा है। अब उनकी जगह ले रहे हैं महंगे प्राइवेट स्कूल, जयपुरिया, गोयनका, डीपीएस, सिंघानिया, सिटी मॉन्टेसरी, दून स्कूल, जिनकी फीस इतनी ज़्यादा है कि एक मज़दूर परिवार की पूरी महीने की कमाई भी उसमें कम पड़ जाए। ऐसे में गरीब का बच्चा कहाँ पढ़ेगा?

अशोका यूनिवर्सिटी, गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसे निजी संस्थान डिग्रियों को बाज़ार में बेच रहे हैं। नई नीति के तहत सीट कटौती, फेलोशिप खत्म, और सरकारी कॉलेजों की बंदी जैसे फ़ैसले सिर्फ़ इसीलिए लिए जा रहे हैं ताकि दलित, पिछड़े, वंचित समाज के बच्चे शिक्षा से दूर रहें और सत्ता से सवाल न कर सकें?

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अनिल यादव एक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो Anil Yadav Ayodhya के नाम से जाने जाते हैं। अनिल यादव की कलम सच्चाई की गहराई और साहस की ऊंचाई को छूती है। सामाजिक न्याय, राजनीति और ज्वलंत मुद्दों पर पैनी नज़र रखने वाले अनिल की रिपोर्टिंग हर खबर को जीवंत कर देती है। उनके लेख पढ़ने के लिए लगातार The Jan Post से जुड़े रहें, और ताज़ा अपडेट के लिए उन्हें एक्स (ट्विटर) पर भी फॉलो करें।

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